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बंगाल S.I.R. में बड़ा सवाल: फैसला हुए मामलों में 93% नाम फिर जुड़े, सुप्रीम कोर्ट में सामने आया आंकड़ा

बंगाल S.I.R. में बड़ा सवाल: फैसला हुए मामलों में 93% नाम फिर जुड़े, सुप्रीम कोर्ट में सामने आया आंकड़ा

धरमजयगढ़- पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (S.I.R.) को लेकर अब सुप्रीम कोर्ट में सामने आए आंकड़ों ने प्रक्रिया को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। निर्वाचन आयोग की ओर से अदालत में प्रस्तुत जानकारी के मुताबिक, S.I.R. से संबंधित 38,20,683 अपीलें दायर की गई थीं, लेकिन 18 सितंबर 2026 तक इनमें से केवल 1,02,231 अपीलों का निपटारा हुआ था। यानी करीब 37.18 लाख मामले अब भी लंबित थे।

इसी बीच, जिन मामलों का फैसला हो चुका है, उनमें लगभग 93 प्रतिशत मतदाताओं के नाम दोबारा मतदाता सूची में शामिल किए जाने की जानकारी सामने आई है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार यह प्रतिशत केवल निपटाए गए मामलों से संबंधित है, न कि सभी 38.20 लाख अपीलों से।


93 प्रतिशत नाम वापस जुड़े तो प्रक्रिया पर सवाल क्यों?


S.I.R. का उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन करना और मृत, स्थानांतरित, अनुपस्थित अथवा अन्य कारणों से अयोग्य प्रविष्टियों की पहचान करना बताया गया है। पश्चिम बंगाल की अंतिम सूची में लगभग 27.16 लाख नाम हटाए गए थे। इनमें से 22 लाख से अधिक लोगों ने नाम बहाल कराने के लिए अपील की थी।

अगस्त में उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, जिन अपीलों का उस समय फैसला हुआ था, उनमें 91.13 प्रतिशत मामलों में नाम मतदाता सूची में शामिल करने का निर्णय हुआ था। बाद के आंकड़ों में यह अनुपात लगभग 93 प्रतिशत बताया गया।

यही आंकड़ा अब बहस का प्रमुख विषय बन गया है कि यदि जांच के बाद हटाए गए मतदाताओं में बड़ी संख्या में लोगों के नाम अपील के बाद फिर सही पाए गए, तो प्रारंभिक स्तर पर नाम हटाने की प्रक्रिया में किन कारणों से इतनी बड़ी संख्या में विवाद पैदा हुआ।


सुप्रीम कोर्ट के सामने लंबित मामलों का बड़ा आंकड़ा


सुप्रीम कोर्ट में निर्वाचन आयोग द्वारा दाखिल हलफनामे के अनुसार 38,20,683 अपीलों में से केवल 1,02,231 का निपटारा हुआ है। अदालत के समक्ष यह भी सामने आया कि इन अपीलों में नाम जोड़ने और नाम हटाने—दोनों प्रकार के मामले शामिल हैं। आयोग के हलफनामे में इन दोनों श्रेणियों का पूरा अलग-अलग ब्योरा उपलब्ध नहीं कराया गया था।

इससे एक और सवाल उठता है कि लंबित मामलों का वास्तविक स्वरूप क्या है और कितने लोग ऐसे हैं जिनके नाम हटाए जाने के बाद बहाली की मांग की गई है।


बंगाल की राजनीति और S.I.R. पर आरोप-प्रत्यारोप


पश्चिम बंगाल में 1977 से 2011 तक वाम मोर्चे का लंबा शासन रहा। इसके बाद 2011 में तृणमूल कांग्रेस ने सत्ता हासिल की और ममता बनर्जी के नेतृत्व में सरकार बनी। 1998 में ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस का गठन किया था।

S.I.R. को लेकर राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप भी तेज रहे हैं। कुछ विपक्षी नेताओं ने मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं, अवैध प्रवासियों के नाम शामिल होने और वोट बैंक की राजनीति जैसे आरोप लगाए हैं। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस सहित विपक्षी दलों ने S.I.R. के जरिए वास्तविक मतदाताओं के नाम प्रभावित होने की आशंका जताई है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि को लेकर अलग-अलग दावे सामने आते रहे हैं।

इसलिए किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए अपीलों के अंतिम निपटारे और निर्वाचन आयोग के आधिकारिक आंकड़ों को देखना महत्वपूर्ण होगा।


छत्तीसगढ़ में भी S.I.R. के बाद करीब 25 लाख नाम हटे


छत्तीसगढ़ में भी S.I.R. प्रक्रिया के बाद मतदाता सूची में बड़ी संख्या में नाम हटाए गए। प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार, अंतिम मतदाता सूची जारी होने पर 24,99,823 नाम हटाए गए, जबकि अंतिम सूची में कुल 1,87,30,914 मतदाता दर्ज हुए।

यह आंकड़ा भी प्रदेश में चर्चा का विषय बना हुआ है। खासकर ऐसे क्षेत्रों में जहां राजनीतिक मुकाबला करीबी रहा है, वहां यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि हटाए गए नामों में कितने वास्तविक मतदाता थे और कितने मृत, स्थानांतरित, अनुपस्थित या अन्य कारणों से हटाए गए थे।


असली सवाल: S.I.R. की जांच कितनी पारदर्शी?


पश्चिम बंगाल के आंकड़ों ने यह सवाल जरूर खड़ा किया है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया में नाम हटाने से पहले सत्यापन और नाम बहाली की अपील प्रक्रिया कितनी प्रभावी रही।

हालांकि, 93 प्रतिशत बहाली का आंकड़ा केवल उन मामलों का है जिनका फैसला हो चुका है। अभी लाखों अपीलें लंबित हैं। इसलिए पूरे S.I.R. की अंतिम तस्वीर सामने आने के लिए सभी लंबित मामलों के निपटारे और निर्वाचन आयोग के विस्तृत आंकड़ों का इंतजार करना होगा।


अब बड़ा सवाल यही है—क्या S.I.R. वास्तव में मतदाता सूची को अधिक शुद्ध और पारदर्शी बनाने की प्रक्रिया साबित होगी, या बड़ी संख्या में अपीलों में नाम बहाल होने से प्रारंभिक सत्यापन प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल खड़े होंगे?

Author
संपादक : दीपक कुमार हलदार
Hamar Goth News 24

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