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धरमजयगढ़, रायगढ़- दुर्गापुर कोल ब्लॉक को लेकर जमीन, सर्वे, भू-अर्जन और मुआवजे की दर का मुद्दा लगातार गरमाता जा रहा है। एक ओर प्रभावित ग्रामीणों की ओर से कैमरे के सामने “हम जमीन नहीं देंगे” का बयान सामने आ रहा है, वहीं दूसरी ओर इसी मामले में जमीन का रेट बढ़ाने और बगल के गांव की जमीन को भी शामिल करने संबंधी मांग से जुड़े दस्तावेज सामने आने का दावा किया जा रहा है।
यही दो अलग-अलग बातें अब पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल बनकर सामने आई हैं। मामला सिर्फ जमीन देने या नहीं देने का नहीं रह गया है, बल्कि सवाल यह भी है कि अलग-अलग तारीखों में किस स्तर पर क्या मांग रखी गई और उसका वास्तविक स्वरूप क्या था?
दुर्गापुर क्षेत्र में प्रभावित ग्रामीणों के ऐसे बयान सामने आए हैं, जिनमें जमीन देने से इनकार किया जा रहा है। लेकिन दूसरी ओर उपलब्ध दस्तावेजों में जमीन की दर बढ़ाने तथा आसपास के गांव की जमीन को भी शामिल करने से जुड़ी मांगों का उल्लेख होने की बात सामने आ रही है।
अगर भू-अर्जन का ही विरोध है, तो बगल के गांव की जमीन को शामिल करने की मांग क्यों सामने आई?
उपलब्ध जानकारी के अनुसार 28 जून, 30 जून और 2 जुलाई 2026 को प्रभावित ग्रामीणों की ओर से अपनी समस्याओं और मांगों को संबंधित अधिकारियों के समक्ष रखा गया।
इसके बाद 21 अगस्त 2026 को DRCC की बैठक में प्रभावित ग्रामीणों और SECL के बीच चर्चा हुई। बैठक में किन मुद्दों पर बात हुई और उसके बाद क्या स्थिति बनी, यह भी पूरे घटनाक्रम की महत्वपूर्ण कड़ी है।
सवाल यह है कि जब अलग-अलग स्तर पर ज्ञापन दिए गए, बैठक हुई और ग्रामीणों की ओर से अपनी आपत्तियां रखी गईं, तो इसके बावजूद जमीन, सर्वे और भू-अर्जन को लेकर स्थिति अब तक इतनी पेचीदा क्यों बनी हुई है?
लेकिन इसी के साथ मांगों और सार्वजनिक बयानों में यदि अंतर दिखाई देता है, तो उस पर स्पष्टीकरण भी जरूरी है।
दस्तावेज जनता के सामने
दुर्गापुर कोल ब्लॉक का मामला संवेदनशील है। इसलिए किसी एक पक्ष को सही या गलत ठहराने से पहले उपलब्ध रिकॉर्ड को देखना जरूरी है।
हमारा उद्देश्य किसी व्यक्ति या समूह पर आरोप लगाना नहीं, बल्कि उपलब्ध दस्तावेजों और वीडियो में दर्ज तथ्यों को जनता के सामने है।
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