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100.25% अंक देखकर मचा हड़कंप! MBA के रिजल्ट में ऐसी गड़बड़ी कि परीक्षा व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
धर्मजयगढ़-उज्जैन, मध्य प्रदेशसम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय के परीक्षा परिणाम ने शिक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। MBA चौथे सेमेस्टर के एक छात्र की मार्कशीट में अधिकतम 1600 अंकों के मुकाबले 1604 अंक दर्ज हो गए। नतीजा यह हुआ कि छात्र का प्रतिशत 100.25% तक पहुंच गया।
आखिर 100 प्रतिशत से ज्यादा अंक कैसे?
सवाल सीधा है—जब मार्कशीट में अधिकतम अंक 1600 निर्धारित हैं, तो छात्र के खाते में 1604 अंक कैसे दर्ज हो गए? क्या परिणाम तैयार करने वाले सिस्टम में पर्याप्त ऑटोमेटिक वैलिडेशन नहीं है? और यदि यह गलती सिस्टम में हुई तो परिणाम जारी होने से पहले इसकी जांच किस स्तर पर की गई?
जानकारी के मुताबिक छात्र के अलग-अलग सेमेस्टर के अंकों का योग 1604 बन रहा था, जबकि मार्कशीट में अधिकतम अंक 1600 दिखाए गए। विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसे तकनीकी त्रुटि बताया है।
सिर्फ MBA नहीं, M.Sc. के रिजल्ट में भी गड़बड़ी
मामला यहीं खत्म नहीं होता। M.Sc. द्वितीय सेमेस्टर के एक छात्र के परिणाम में प्रैक्टिकल के अंक दर्ज नहीं होने के बावजूद उसे पास घोषित किए जाने की बात भी सामने आई है।
एक ही परीक्षा परिणाम प्रक्रिया में अलग-अलग प्रकार की विसंगतियां सामने आने के बाद अब सवाल उठना लाजिमी है कि विश्वविद्यालय की रिजल्ट तैयार करने और सत्यापन की पूरी प्रक्रिया कितनी भरोसेमंद है?
छात्रों के भविष्य से जुड़ा है मामला
परीक्षा परिणाम महज कुछ अंकों का हिसाब नहीं होता। यही अंक आगे चलकर विद्यार्थियों की मार्कशीट, डिग्री, नौकरी, उच्च शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
ऐसे में यदि परिणाम में 1600 की जगह 1604 अंक दर्ज हो सकते हैं और प्रतिशत 100.25% पहुंच सकता है, तो यह महज तकनीकी गलती है या परिणाम प्रणाली की निगरानी में गंभीर कमी—इसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है।
विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने बड़े सवाल
(1) परिणाम जारी होने से पहले मार्कशीट का सत्यापन किसने किया?
(2) अधिकतम अंकों से अधिक अंक दर्ज होने पर सिस्टम ने चेतावनी क्यों नहीं दी?
(3) M.Sc. छात्र के प्रैक्टिकल अंक परिणाम में क्यों नहीं जुड़े?
(4) क्या ऐसे और भी परिणामों में तकनीकी विसंगतियां हैं?
(5) परिणाम तैयार करने वाली एजेंसी की जिम्मेदारी तय होगी या नहीं?
(6) विद्यार्थियों को हुई परेशानी की जवाबदेही आखिर किसकी होगी?
“तकनीकी त्रुटि” कहकर मामला खत्म नहीं होना चाहिए!
विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसे तकनीकी गलती बताते हुए सुधार की बात कही है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि तकनीकी गलती आखिर हुई क्यों और उसे पकड़ने की जिम्मेदारी किसकी थी?
विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़े दस्तावेजों में ऐसी विसंगतियों को गंभीरता से लेते हुए विश्वविद्यालय को पूरी प्रक्रिया की समीक्षा करनी चाहिए और यह स्पष्ट करना चाहिए कि भविष्य में ऐसी घटना दोबारा न हो, इसके लिए क्या ठोस कदम उठाए जा रहे हैं।
मुख्य सवाल: अगर 1600 में 1604 अंक आ सकते हैं, तो रिजल्ट सिस्टम पर भरोसा कैसे किया जाए?
यह सिर्फ एक छात्र की मार्कशीट का मामला नहीं, बल्कि परीक्षा परिणाम प्रणाली की विश्वसनीयता पर उठता बड़ा सवाल है।
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