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धरमजयगढ़-नगर पंचायत धरमजयगढ़ के वार्ड क्रमांक 08 में बनी करीब ₹3.89 लाख की आरसीसी नाली इन दिनों पानी से ज्यादा सवाल बहा रही है। नाली बनी, माप पुस्तिका में माप दर्ज हुआ, भुगतान हुआ और 11 मई 2026 को ₹3,89,668 की राशि आरटीजीएस से ठेकेदार के खाते में पहुंचने की बात सामने आई। लेकिन कहानी में असली ट्विस्ट तब आया, जब संबंधित ठेकेदार ने पुलिस के सामने कहा—“मैंने तो बिल ही नहीं लगाया और भुगतान मांगा ही नहीं!”
नगर पंचायत धरमजयगढ़ की ओर से पुलिस को भेजे गए पत्र में बताया गया कि वार्ड क्रमांक 08 में आंगनबाड़ी से यशपाल साहू के घर तक आरसीसी नाली निर्माण कराया गया। ठेकेदार शेष कुमार साहू द्वारा निर्माण कार्य का अनुबंध किए जाने, स्थल पर कार्य दिखाए जाने और माप पुस्तिका में कार्य दर्ज किए जाने के बाद भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
इसके बाद ₹3,89,668 का भुगतान आरटीजीएस के जरिए ठेकेदार के खाते में किए जाने का उल्लेख है।
यहां तक तो कहानी बिल्कुल सीधी थी।
लेकिन तभी ठेकेदार का आवेदन आया और पूरी कहानी ने ऐसा मोड़ लिया कि सवालों की गाड़ी सीधे नगर पंचायत के कागजों के सामने आकर खड़ी हो गई।
ठेकेदार बोले—“बिल किसने लगाया, मुझे भी बताइए!”
ठेकेदार शेष कुमार साहू ने अनुविभागीय अधिकारी पुलिस, धरमजयगढ़ को दिए आवेदन में नगर पंचायत के आरोपों को भ्रामक, एकपक्षीय और पूर्व नियोजित बताया है।
ठेकेदार के अनुसार उन्होंने न तो निर्माण कार्य के एवज में कोई बिल प्रस्तुत किया और न ही भुगतान की मांग की। आवेदन में उन्होंने यह भी कहा है कि 10 जून 2026 को नगर पंचायत के साथ कोई अनुबंध नहीं किया।
इतना ही नहीं, ठेकेदार का दावा है कि उनके बैंक खाते में ₹3,89,668 जमा होने की जानकारी भी उन्हें पहले से नहीं दी गई थी और इसकी जानकारी उन्हें नगर पंचायत से मिले नोटिस के बाद हुई।
अब जनता का सवाल बिल्कुल सीधा है—
जब ठेकेदार ने बिल नहीं लगाया, तो बिल आया कहां से?
अगर भुगतान की मांग नहीं हुई, तो भुगतान की फाइल चली कैसे?
और अगर अनुबंध को लेकर ही विवाद है, तो फाइल में अनुबंध की कहानी किस आधार पर लिखी गई?
नाली छोटी, सवाल बड़े!
वार्ड क्रमांक 08 की नाली की लंबाई भले ही सीमित हो, लेकिन इस मामले में सवालों की लंबाई लगातार बढ़ती जा रही है।
जांच में अगर दस्तावेज सामने आते हैं तो सबसे पहले देखना होगा—
- अनुबंध की वास्तविक तारीख क्या है?
- कार्यादेश कब जारी हुआ?
- बिल किसने और कब प्रस्तुत किया?
- माप पुस्तिका में माप किस अधिकारी ने दर्ज किया?
- भुगतान की स्वीकृति किस स्तर पर हुई?
- आरटीजीएस के लिए कौन-कौन से दस्तावेज लगाए गए?
- और आखिर ₹3,89,668 की राशि किस आधार पर जारी हुई?
अब असली ‘माप’ कागजों का होगा!
मामले में फिलहाल आरोप और दावे आमने-सामने हैं। इसलिए अंतिम सच जांच के बाद ही सामने आएगा। लेकिन इतना जरूर है कि अनुबंध, बिल, माप पुस्तिका, कार्यादेश, भुगतान स्वीकृति और बैंक रिकॉर्ड इस पूरी कहानी के सबसे महत्वपूर्ण किरदार बनने वाले हैं।
अगर नगर पंचायत के दस्तावेज सही हैं तो भुगतान की पूरी प्रक्रिया स्पष्ट होनी चाहिए। और यदि ठेकेदार का दावा सही निकलता है कि उन्होंने बिल ही प्रस्तुत नहीं किया, तो फिर सवाल यह उठेगा कि भुगतान की फाइल आखिर किसके इशारे पर और किस आधार पर आगे बढ़ी?
फिलहाल वार्ड क्रमांक 08 में नाली पानी बहा रही है या नहीं, यह एक अलग मुद्दा है। लेकिन ₹3.89 लाख के भुगतान ने सवालों की ऐसी धारा जरूर खोल दी है, जिसकी निकासी अब सिर्फ निष्पक्ष जांच से ही हो सकती है।
क्योंकि इस कहानी में नाली तो आरसीसी की है… लेकिन असली मामला कागजों की ‘मजबूती’ का है!
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