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राष्ट्रीय शिक्षा नीति और मुख्यमंत्री की घोषणा पर अमल नहीं होने का आरोप

राष्ट्रीय शिक्षा नीति और मुख्यमंत्री की घोषणा पर अमल नहीं होने का आरोप

प्रदेश के बंग समाज के संगठनों ने उठाए सवाल, कहा—भाजपा की कथनी और करनी में अंतर


धरमजयगढ़- छत्तीसगढ़ में बंगाली भाषी समुदाय की मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा को लेकर एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। प्रदेश के विभिन्न बंग समाज संगठनों ने राज्य सरकार पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति तथा मुख्यमंत्री की घोषणा के बावजूद बंगला भाषा में प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था लागू नहीं करने का आरोप लगाया है। संगठनों का कहना है कि सरकार की घोषणा के बाद समुदाय में उम्मीद जगी थी, लेकिन वर्तमान सहायक शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में बंगला भाषा के शिक्षकों के लिए पद का प्रावधान नहीं किए जाने से समाज में निराशा बढ़ी है।


बंग समाज के प्रतिनिधियों के अनुसार छत्तीसगढ़ के उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक विभिन्न क्षेत्रों में बंगाली समुदाय की बसाहट रही है। विशेष रूप से कांकेर जिले के पखांजूर एवं परालकोट क्षेत्र में बड़ी संख्या में बंगाली परिवारों का पुनर्वास हुआ है। समाज का दावा है कि प्रदेश की कुल आबादी में बंगाली भाषी समुदाय की हिस्सेदारी भी उल्लेखनीय है।


1962 से 1989 तक मातृभाषा में शिक्षा का इतिहास


बंग समाज के संगठनों का कहना है कि पुनर्वास क्षेत्रों में लंबे समय तक प्रारंभिक शिक्षा बंगला भाषा के माध्यम से दी जाती रही है। उनका कहना है कि वर्ष 1962 से 1989 के बीच इन क्षेत्रों में बंगला भाषा के माध्यम से प्रारंभिक शिक्षा की व्यवस्था रही, लेकिन बाद में यह व्यवस्था समाप्त हो गई।


समाज के प्रतिनिधियों का तर्क है कि बच्चों को उनकी मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा मिलने से वे विषयों को अधिक सहजता और प्रभावी ढंग से समझ सकते हैं। इसी आधार पर बंग समाज लंबे समय से प्राथमिक स्तर पर बंगला भाषा में शिक्षा की व्यवस्था पुनः शुरू करने की मांग करता रहा है।


मुख्यमंत्री की घोषणा से जगी थी उम्मीद


बंग समाज के अनुसार जनवरी में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के पखांजूर दौरे के दौरान समुदाय के प्रतिनिधियों ने मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा का मुद्दा प्रमुखता से उठाया था। समाज का दावा है कि मुख्यमंत्री ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रावधानों के अनुरूप इसी शैक्षणिक सत्र से मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा शुरू करने की घोषणा की थी।


इसके बाद बंग समाज में उम्मीद जगी थी कि बंगला भाषा के लिए शिक्षकों की नियुक्ति का रास्ता खुलेगा। समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के समक्ष भी इस मुद्दे को रखा गया था, जहां उन्हें आश्वासन मिला था। प्रतिनिधियों के मुताबिक पुनर्वास से संबंधित पुराने दस्तावेजों का अवलोकन भी किया गया और मुख्यमंत्री से चर्चा कर मांग को लागू कराने की बात कही गई थी।


सहायक शिक्षक भर्ती में बंगला भाषा के पद नहीं होने से नाराजगी


अब राज्य सरकार द्वारा 2292 सहायक शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया शुरू किए जाने के बीच बंग समाज ने सवाल उठाए हैं। समाज के संगठनों का आरोप है कि भर्ती प्रक्रिया में बंगला भाषा के सहायक शिक्षकों के पद का प्रावधान नहीं किया गया है।


बंग समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद समुदाय के लोगों ने इसे बड़ी उम्मीद के रूप में देखा था। कई लोगों ने इसे लेकर खुशी भी जाहिर की थी, लेकिन भर्ती प्रक्रिया में बंगला भाषा के शिक्षकों का प्रावधान नहीं होने से अब निराशा का माहौल है।


संविधान और शिक्षा नीति के प्रावधानों का हवाला


बंग समाज के संगठनों ने अपनी मांग के समर्थन में संविधान के अनुच्छेद 350A, शिक्षा का अधिकार अधिनियम और राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के प्रावधानों का हवाला दिया है। उनका कहना है कि मातृभाषा अथवा स्थानीय भाषा में प्रारंभिक शिक्षा को बढ़ावा देने की नीति पहले से मौजूद है और इसी भावना के अनुरूप राज्य सरकार को बंगला भाषी क्षेत्रों में भी आवश्यक शिक्षकों की व्यवस्था करनी चाहिए।


संगठनों का कहना है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में प्रारंभिक शिक्षा के स्तर पर बच्चों को उनकी मातृभाषा, स्थानीय भाषा या क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाई का अवसर देने पर जोर दिया गया है। ऐसे में छत्तीसगढ़ में लंबे समय से बंगला भाषा में शिक्षा की मांग कर रहे समुदाय की समस्या पर सरकार को स्पष्ट निर्णय लेना चाहिए।


“घोषणा के बाद उम्मीद थी, अब निराशा”


बंग समाज के विभिन्न संगठनों का कहना है कि सरकार की घोषणा के बाद समुदाय ने इसे सकारात्मक पहल के रूप में देखा था। लेकिन वर्तमान भर्ती प्रक्रिया में बंगला भाषा के शिक्षकों के लिए पद नहीं होने से समाज में यह सवाल उठने लगा है कि आखिर मुख्यमंत्री की घोषणा कब और किस रूप में लागू होगी।


समाज के प्रतिनिधियों ने कहा कि यदि सरकार वास्तव में मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है, तो बंगला भाषी क्षेत्रों में आवश्यकतानुसार बंगला भाषा के सहायक शिक्षकों की भर्ती का प्रावधान किया जाना चाहिए।


इसी मुद्दे को लेकर बंग समाज के बीच अब “भाजपा की कथनी और करनी में अंतर” जैसी चर्चाएं भी सामने आने लगी हैं। कुछ प्रतिनिधियों का कहना है कि पिछली सरकार के कार्यकाल की तुलना में वर्तमान सरकार से उन्हें अधिक उम्मीद थी, लेकिन घोषणा के बावजूद जमीनी स्तर पर कार्रवाई नहीं होने से समुदाय में असंतोष बढ़ रहा है।



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संपादक : दीपक कुमार हलदार
मेरा नाम दीपक कुमार हलदार है, और मैं Hamar Goth News 24 का संस्थापक एवं संपादक हूँ।

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